कभी ख़ामोश रहते हैं कभी यूँँ बात करते हैं

ये आधे और अधूरे लब बहुत आघात करते हैं

कभी नीलाम कर पाए न पुस्तैनी हवेली हम
बड़ी तरक़ीब से नीलाम वो जज़्बात करते हैं

सजाते थे ये बच्चे ख़्वाब कल की बात हो जैसे
पर अब हाथों में ख़ंजर हैं ये सब हालात करते हैं

कोई नक्सल नहीं होता यहाँ पर शौक से साहब
हैं बस्ती के नुमाइंदे कुठाराघात करते हैं

कभी पुर नम न कर पाए कि आँखें दर्द में भी जो
उन्हीं को कह रहे हैं वो के वो बरसात करते हैं

— Ajeetendra Aazi Tamaam

More by Ajeetendra Aazi Tamaam

Other ghazal from the same pen

See all from Ajeetendra Aazi Tamaam →

Aarzoo Shayari

Shers of aarzoo.

All Aarzoo Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling