ज़माना मर्द होता जा रहा है
बहुत बे-दर्द होता जा रहा है
फिर इक सफ़्हा किताब-ए-ज़िंदगी का
वो देखो गर्द होता जा रहा है
नहीं बच पाएगा ये साल भी अब
दिसंबर सर्द होता जा रहा है
गिरेगा टूट कर जल्दी शजर से
ये पत्ता ज़र्द होता जा रहा है
बनेगा दर्द का कारण किसी दिन
वो जो हमदर्द होता जा रहा है
उठो जागो मिटा दो बेबसी को
बहुत सरदर्द होता जा रहा है
— Ajeetendra Aazi Tamaam















