"मटर"
ज़िंदगी भी मटर के जैसी है
तह खोलो बिखरने लगती है
कितने दाने महफूज़ रहते हैं उन फलियों की आग़ोशी में
कुछ टेढ़े से कुछ बुचके से कुछ फूले से कुछ पिचके से
हू-ब-हू रिश्तों के जैसे लगते हैं
कुनबे से परिवारों से कुछ सगे या रिश्तेदारों से
पर सभी आज़ाद होना चाहते हैं क़ैद से
रिवायतों से बंदिशों से बाग़बाँ से साज़िशों से
ज़िंदगी भी मटर के जैसी है
तह खोलो बिखरने लगती है
— Ajeetendra Aazi Tamaam















