चाँद सूरज को कहीं से खा रहा है
कोई अच्छा सा उजाला आ रहा है
कुछ गुलाबों की भी लाली बढ़ गई है
कोई थोड़ा छू कर उन को जा रहा है
फिर से ठंडी सी हवाएँ चल रही हैं
कोई महफ़िल में तराना गा रहा है
मेरा तकिया मेरा बिस्तर मेरा कमरा
आज अरसे बा'द मुझ को भा रहा है
मेरी आँखें आज ख़ुद से सो रही हैं
कोई मेरे ख़्वाब मुझ तक ला रहा है
— Abhinav Srivastav















