Abhinav Srivastav

Abhinav Srivastav

@abhitauro19

Abhinav Srivastav shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Abhinav Srivastav's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

दिल की चले हमेशा ही ऐसा भी नहीं होता दिल की चले हमेशा तो अच्छा भी नहीं होता — Abhinav Srivastav

Ghazal

सब कुछ थोड़ा थोड़ा अपने अंदर रक्खा था मैं ने दरिया छोड़ा था फिर सागर रक्खा था बचपन के दिन कैसे सब जादू हो जाता था बाबा ने शायद ख़ुद में जादूगर रक्खा था हिज्र का दिन था घर पर पंखा भी थोड़ा तन्हा था रस्सी मैं ने आज नहीं ये कह कर रक्खा था भूला इस दुनिया की सारी मारा मारी मैं माँ ने जब आँचल मेरे माथे पर रक्खा था कुछ दिन पर जब लौटा सैनिक अपने घर को तो उस ने देखा घर में सूना बिस्तर रक्खा था हर देखे अनदेखे सपने सच लगते थे तब पर सच के उस झोले में तो दफ़्तर रखा था महफ़िल में लोगों पर इक ख़ामोशी छाई थी मैं ने उस महफ़िल में कुछ तो बेहतर रक्खा था — Abhinav Srivastav
कोई अपना ज़रूरी है सफ़र बेहतर बनाने को मिले तो साथ दे देना गुज़र बेहतर बनाने को भले ही ख़ूब-सूरत हों दर-ओ-दीवार कितने भी बड़ों का साथ हो लेकिन वो घर बेहतर बनाने को बहारों में अगर ग़ुंचे निकलते हैं तो पतझड़ में वहाँ पत्ते भी गिरते हैं शजर बेहतर बनाने को किसी के पास आती है विरासत में ही सब दौलत किसी को उम्र लगती है बसर बेहतर बनाने को बहुत शफ़्फ़ाफ़ हो तो भी कोई दामन नहीं जँचता कि थोड़े दाग़ अच्छे है क़मर बेहतर बनाने को असर वैसे नहीं आता मुझे जितना पिला दो तुम पुराने यार लगते हैं असर बेहतर बनाने को बड़ी आसान दिखती है तुम्हें मेरी ये फ़नकारी यहाँ पर दम निकलता है हुनर बेहतर बनाने को — Abhinav Srivastav
फ़रिश्तों फिर निकल आओ मुसीबत हो रही है अब ज़माने में जहालत की हुकूमत हो रही है अब यहीं डर है शजर सारे भरोसे पे न रह जाएँ कि जंगल को बचाने की तिजारत हो रही है अब मैं प्यासा रह रहा हूँ एक नद्दी के मुहाने पर मुझे साहिल के इन रेतों की आदत हो रही है अब बहुत अर्सा रहा तन्हा मैं ख़ुद से दिल लगा लूँ क्या मिरे दिल को मुहब्बत की ज़रूरत हो रही है अब सुनाने को कोई अच्छी कहानी ही नहीं मिलती सभी को इश्क़ करने की सुहूलत हो रही है अब मुहल्ले में तो बच्चों को मिसालें मेरी मिलती हैं कि देखो शौक़ में कैसी फ़ज़ीहत हो रही है अब कभी तो चूम कर देखूँगा उस के काँच को भी मैं तिरे हाथों को जिस चूड़ी से क़ुर्बत हो रही है अब मिरी बेटी नहीं सोती मैं जब तक घर न आ जाऊँ ख़ुदा की मुझ पे ऐसी भी इनायत हो रही है अब मिरे अंदर का इक लड़का सयाना है बहुत लेकिन ग़ज़ल कहता तो लगता है बग़ावत हो रही है अब — Abhinav Srivastav
घर में अब दीवार बहुत हैं फिर भी तन्हाई है लोगों पर दीनार बहुत हैं फिर भी तन्हाई है रिश्ते नातों से भूख प्यास तक सबके सौदे हैं यूँँ शहर में बाज़ार बहुत हैं फिर भी तन्हाई है कितनी यादें कितनी बातें कितना कुछ कहना है शाइ'र पे अश'आर बहुत हैं फिर भी तन्हाई है इतनी छोटी दुनिया में सब आस पास ही रहते हैं मिलने के आसार बहुत हैं फिर भी तन्हाई है बड़ी अजब सी हालत है कैसे किस को समझाएँ महफ़िल में किरदार बहुत हैं फिर भी तन्हाई है कितने नए पुराने क़िस्से भी हैं सरगोशी को फिर पढ़ने को अख़बार बहुत हैं फिर भी तन्हाई है अब थोड़े से पल भी हैं फ़ुर्सत के और इधर तो महीने में इतवार बहुत हैं फिर भी तन्हाई है — Abhinav Srivastav