कोई अपना ज़रूरी है सफ़र बेहतर बनाने को

मिले तो साथ दे देना गुज़र बेहतर बनाने को

भले ही ख़ूब-सूरत हों दर-ओ-दीवार कितने भी
बड़ों का साथ हो लेकिन वो घर बेहतर बनाने को

बहारों में अगर ग़ुंचे निकलते हैं तो पतझड़ में
वहाँ पत्ते भी गिरते हैं शजर बेहतर बनाने को

किसी के पास आती है विरासत में ही सब दौलत
किसी को उम्र लगती है बसर बेहतर बनाने को

बहुत शफ़्फ़ाफ़ हो तो भी कोई दामन नहीं जँचता
कि थोड़े दाग़ अच्छे है क़मर बेहतर बनाने को

असर वैसे नहीं आता मुझे जितना पिला दो तुम
पुराने यार लगते हैं असर बेहतर बनाने को

बड़ी आसान दिखती है तुम्हें मेरी ये फ़नकारी
यहाँ पर दम निकलता है हुनर बेहतर बनाने को

— Abhinav Srivastav

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