उस के कूचे से बहल के आ गए

हम कहीं से तो बदल के आ गए

जबसे वो इस शहर में शामिल हुआ
हम भी अंदर से महल के आ गए

चाँदनी भी आज उस पे आ गई
बर्फ़ से हम भी पिघल के आ गए

हश्र-ज़ा सा उस का जाना हो गया
दर्द सारे फिर ख़लल के आ गए

एक कोने में पड़े थे बिखरे से
उस को देखा और निकल के आ गए

— Abhinav Srivastav

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