लाख ग़म थे मैं ने बोतल खोल ली
दिन भी कम थे मैं ने बोतल खोल ली
तब से लौटा ही नहीं वो जो गया
प्याले नम थे मैं ने बोतल खोल ली
अच्छा ख़ासा आदमी था मर गया
टूटे दम थे मैं ने बोतल खोल ली
दिल-लगी का मुझ को हासिल मिल गया
दूर हम थे मैं ने बोतल खोल ली
बज़्म उस की रिंदों की बस्ती लगी
क्या भरम थे मैं ने बोतल खोल ली
लोग पढ़ते थे दुआऍं रात तक
ज़ेर-ओ-बम थे मैं ने बोतल खोल ली
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझा मैं जब
दो क़दम थे मैं ने बोतल खोल ली
— Abhinav Srivastav















