सब कुछ थोड़ा थोड़ा अपने अंदर रक्खा था
मैं ने दरिया छोड़ा था फिर सागर रक्खा था
बचपन के दिन कैसे सब जादू हो जाता था
बाबा ने शायद ख़ुद में जादूगर रक्खा था
हिज्र का दिन था घर पर पंखा भी थोड़ा तन्हा था
रस्सी मैं ने आज नहीं ये कह कर रक्खा था
भूला इस दुनिया की सारी मारा मारी मैं
माँ ने जब आँचल मेरे माथे पर रक्खा था
कुछ दिन पर जब लौटा सैनिक अपने घर को तो
उस ने देखा घर में सूना बिस्तर रक्खा था
हर देखे अनदेखे सपने सच लगते थे तब
पर सच के उस झोले में तो दफ़्तर रखा था
महफ़िल में लोगों पर इक ख़ामोशी छाई थी
मैं ने उस महफ़िल में कुछ तो बेहतर रक्खा था
— Abhinav Srivastav















