हालात में उलझे हैं ये सुलझाए हुए लोग
किस फ़िक्र के मारे हैं यहाँ आए हुए लोग
अंदाज़ा किताबों का कहाँ जिल्द से लगता
हँसते भी दिखा करते हैं ग़म खाए हुए लोग
उस पार की दुनिया ने भी कुछ शर्त है रख दी
अब और कहाँ जाएँ सब उकताए हुए लोग
ये राह-गुज़र देख के इस नस्ल की फिर आज
झल्ला के निकल आएँ न दफ़नाए हुए लोग
अरमान तिरे दीद के जिस रोज़ हो हासिल
ख़ुश हो के न मर जाएँ ये पगलाए हुए लोग
— Abhinav Srivastav















