चारा-गर के बस की बात नहीं है अब
सच बोलूँ ये अच्छी बात नहीं है अब
दिल पर सारे जंतर मंतर ज़ाये हैं
ये कोई मामूली बात नहीं है अब
तेरे आगे बाक़ी सब कुछ फीका है
शक्कर में भी शीरीं बात नहीं है अब
दुनिया पहले सी बे-रंग नहीं लगती
तुम सोचो क्यूँ वैसी बात नहीं है अब
क़स
में खाना क़समों में जीना मरना
ये तो कोई झूठी बात नहीं है अब
सब कहते हैं मैं भी कुछ बदला सा हूँ
मुझ
में मेरे जैसी बात नहीं है अब
— Abhinav Srivastav















