फ़रिश्तों फिर निकल आओ मुसीबत हो रही है अब
ज़माने में जहालत की हुकूमत हो रही है अब
यहीं डर है शजर सारे भरोसे पे न रह जाएँ
कि जंगल को बचाने की तिजारत हो रही है अब
मैं प्यासा रह रहा हूँ एक नद्दी के मुहाने पर
मुझे साहिल के इन रेतों की आदत हो रही है अब
बहुत अर्सा रहा तन्हा मैं ख़ुद से दिल लगा लूँ क्या
मिरे दिल को मुहब्बत की ज़रूरत हो रही है अब
सुनाने को कोई अच्छी कहानी ही नहीं मिलती
सभी को इश्क़ करने की सुहूलत हो रही है अब
मुहल्ले में तो बच्चों को मिसालें मेरी मिलती हैं
कि देखो शौक़ में कैसी फ़ज़ीहत हो रही है अब
कभी तो चूम कर देखूँगा उस के काँच को भी मैं
तिरे हाथों को जिस चूड़ी से क़ुर्बत हो रही है अब
मिरी बेटी नहीं सोती मैं जब तक घर न आ जाऊँ
ख़ुदा की मुझ पे ऐसी भी इनायत हो रही है अब
मिरे अंदर का इक लड़का सयाना है बहुत लेकिन
ग़ज़ल कहता तो लगता है बग़ावत हो रही है अब















