अब वापस अपने घर से रिश्ता रक्खा जाए
सहरा में इक छोटा सा दरिया रक्खा जाए
इक अरसे का बिछड़ा जब कोई मिल जाए फिर
तब शिकवों का बोझा कुछ हल्का रक्खा जाए
घर के पीछे पीपल पर चिड़ियों का जो घर हो
उस घर के चौखट पर भी दाना रक्खा जाए
बाहरस पहले देखें हम ख़ुद के अंदर भी
मन के इक कोने को भी जलता रक्खा जाए
गर दिल में कोई आ कर रुकना जो चाहे तो
आने जाने का भी फिर रस्ता रक्खा जाए
— Abhinav Srivastav















