फूलों से उस को निखारा जा रहा हैतितलियों का हक़ भी मारा जा रहा हैज़ेहन तक सबके उतर जाने की ज़िद थीहुस्न को फिर क्यूँ सँवारा जा रहा है— Abhinav Srivastav