लड़की थी वो अंबरी सी
आँख उस की मर्मरी सी
तपता जलता जून था मैं
वो थी बिल्कुल जनवरी सी
बचपना भीतर छिपा था
बात करती बावरी सी
इक नज़र में भा गई थी
वो मुझे तो शा'इरी सी
कोई आख़िर क्यूँ सुनेगा
अब कहानी दुख भरी सी
— Adarsh Akshar
आँख उस की मर्मरी सी
तपता जलता जून था मैं
वो थी बिल्कुल जनवरी सी
बचपना भीतर छिपा था
बात करती बावरी सी
इक नज़र में भा गई थी
वो मुझे तो शा'इरी सी
कोई आख़िर क्यूँ सुनेगा
अब कहानी दुख भरी सी
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