नज़्में
शे'र कहते कहते थक जाने पर
नज़्मों की ओर लौटा जा सकता है
इतिहास गवाह है कि
नज़्मों ने हमेशा सहर्ष स्वीकारा है शाइरों को
नज़्
में सभी को देखती हैं एक सा
इस लिए वो पाबंद भी होती हैं और आज़ाद भी
पाबंदी और आज़ादी में तालमेल
नज़्
में ही बैठा सकी हैं अबतक
हम नज़्मों से कितना कुछ सीख सकते हैं।
— Adarsh Akshar















