अब काम तुम्हें छोड़ कर आना ही पड़ेगा
खाना मुझे हाथों से खिलाना ही पड़ेगा
इक रोज़ जहाॅं छोड़ के जाना ही पड़ेगा
ये रीत है दुनिया की निभाना ही पड़ेगा
जीवन है यही मान लो बाज़ार को आए
सो शाम तलक घर तुम्हें जाना ही पड़ेगा
रखता नहीं विश्वास मैं भक्ति में ख़ुदा में
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया तो निभाना ही पड़ेगा
दौलत तिरी रिश्ते तिरे बेकार की बातें
इक रोज़ इन्हें छोड़ के जाना ही पड़ेगा
माटी के खिलौने के सिवा कुछ नहीं इंसाँ
माटी को तो माटी में मिलाना ही पड़ेगा
ऐसे तो तुझे आज मैं जाने नहीं दूँगा
चेहरा मुझे इक बार दिखाना ही पड़ेगा
— Prashant Kumar















