गली में रोज़ आया क्यूँँ करूँँ मैं
किसी को देख भागा क्यूँ करूँ मैं
तुम्हारे पास बैठा क्यूँ करूँ मैं
तुम्हारे होंट चूमा क्यूँ करूँ मैं
कि मेरे गुदगुदाया क्यूँ करे तू
तिरे गालों पे मारा क्यूँ करूँ मैं
मिरा ही नाम लिक्खा क्यूँ करे तू
तिरे हाथों को चूमा क्यूँ करूँ मैं
मोहब्बत की नुमाइश क्यूँ करे तू
अदावत का ही वा'दा क्यूँ करूँ मैं
मिरी बातों में आया क्यूँ करे तू
तिरी बातों में आया क्यूँ करूँ मैं
तुझे मैं जानता ही जब नहीं हूँ
मोहब्बत का कि वा'दा क्यूँ करूँ मैं
कहाँ जाते हो अब ये तो बताओ
ख़ुदा से तुम को माँगा क्यूँ करूँ मैं
— Prashant Kumar















