हर एक शख़्स यहाँ बे-क़रार मिलता है
किसी किसी को मगर अपना प्यार मिलता है
गुज़र न जाए कहीं धीरे-धीरे उम्र तिरी
मोहब्बतों में बहुत इंतिज़ार मिलता है
मैं देखना ही नहीं चाहता तिरा चेहरा
तिरी वजह से मुझे रोज़गार मिलता है
न नौकरी ही लगी मेरी और न ब्याह हुआ
लजा रहा हूँ ये ताना हज़ार मिलता है
मैं जानती ही नहीं तुझ को जानना भी नहीं
तू बे-वजह ही मुझे बार-बार मिलता है
बहुत सँभाल के रखता हूँ काँच और पत्थर
तभी तो दिल का मुझे कारोबार मिलता है
— Prashant Kumar















