मिरी नज़र के क़रीब आ कर वो दिल की धड़कन बढ़ा रहे हैं
कभी निगाहें चुरा रहे हैं कभी निगाहें मिला रहे हैं
मलाल कोई नहीं है फिर भी तुम उन से कह दो वहाँ पे बैठें
ज़माना देखो ख़राब है वो सभी की नज़रों में आ रहे हैं
लब उन के ख़ामोश लग रहे पर निगाह सब कुछ बता रही है
जो राज़ दिल में छुपा रखा था वही नज़र से जता रहे हैं
हवा भी रुक-रुक के चल रही है फ़ज़ा भी ठहरी-सी लग रही है
वो अपनी ज़ुल्फ़ें सँवार कर यूँ बहार घर में बुला रहे हैं
हमारे हिस्से की नींद ले कर वो चैन से सो रहे हों शायद
हम उन की यादों के जागरण में चराग़ दिल के जला रहे हैं
न जाने किस बात की ख़ुशी है न जाने किस बात का है सदमा
कभी हँसा कर रुला रहे हैं कभी रुला कर हँसा रहे हैं














