"अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में"

न ये दिल धड़कता न फिर बात होती
न मौसम बदलता न बरसात होती
न दिन ही निकलता न फिर रात होती
अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में
अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में

ज़रा भी किसी का सहारा न होता
अगर तुम न आते गुज़ारा न होता
अकेले-अकेले ही घुट घुट के जीता
सभी आशिक़ों की तरह रोज़ पीता
अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में

इधर लोग मुझ को भिखारी समझते
ये बच्चे गली के मदारी समझते
कई लोग मुझ को जुआरी समझते
मुझे राक्षस भी मुरारी समझते
अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में

कभी भी न इतनी हसीं रात होती
सितारों की महफ़िल कहाँ साथ होती
सदा आँसुओं की ही बरसात होती
कहाँ दिन निकलता कहाँ रात होती
अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में

पता ही न चलता मुझे ज़िंदगी का
कि लेता सहारा मैं फिर ख़ुद-कुशी का
मिटाता मैं नाम-ओ-निशाँ ज़िंदगी का
अरे फिर मैं करता भी क्या ज़िंदगी का
अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में

— Prashant Kumar

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