"नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ"

नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ
मिरी जान हो तुम मिरे पास आओ
नहीं दूर से देख कर मुस्कुराओ
मिरी जाँ मोहब्बत में क्या शर्म करना
ग़लत कुछ नहीं है मोहब्बत में आओ
नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ

मोहब्बत को मेरी न हल्के में लेना
मैं पहुँचा हुआ आदमी हूँ समीना
बहादुर हूँ बंदा किसी से न डरता
मुझे जो भी कहना है मुँह पर ही कहता
सुनाना है जो कुछ भी जल्दी सुनाओ
नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ

मिरी बात का मत बुरा मान जाना
मैं ऐसा ही हूँ यार पागल दिवाना
इधर देखो बातों पे मेरी न जाना
समझदार हो तुम मैं पागल दिवाना
मिरी जान हो तुम मिरे पास आओ
नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ

अगर आह भर के मुझे देखना हो
अगर फूल ऊपर मिरे फेंकना हो
घुमाकर नज़र हर तरफ़ देख लेना
कहीं कोई है तो नहीं पास हमदम
अगर पास हो कोई रुक जाना हमदम
मिरी जान तुम काम दिल से ही लेना
न तुम चुपके चुपके मिरे पास आना
कोई चीज़ मेरे लिए तुम न लाना
अगर देख लेगा कोई क्या कहेगा
वो बदनाम सारे जहाँ में करेगा
मोहब्बत है मुझ से तो मुझ को बताओ
नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ

जिधर बैठता मैं उधर बैठते हो
हमेशा मिरी ही तरफ़ देखते हो
समझदार हो यार समझा करो तुम
मुझे देर तक यूँ न देखा करो तुम
अकेले मिलूँ तब ही बोला करो तुम
कोई सामने हो तो बन जाओ अंजान
फिर ऐसे रहो जैसे हो मेरे मेहमान
करो काम सारे नज़र में मत आओ
नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ

तुम ऐसे में निकलो न लूँ चल रही है
हवा भी कई रंग में ढल रही है
बहुत तेज़ गर्मी इधर बैठ जाओ
लो पानी पियो और फिर मुस्कुराओ
नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ

— Prashant Kumar

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