जाता नहीं है जिस्म से कैसा बुख़ार है
लगता है ये जनाब का पहला बुख़ार है
आया ख़राब वक़्त तो कहने लगे हैं लोग
ख़ुद देखिए ये आप का अपना बुख़ार है
पैसा ही इक अज़ीज़ है जिन को वो कहते हैं
पैसा नहीं है ज़िंदगी पैसा बुख़ार है
कहने लगा तबीब मेरा हाल देख कर
इक शख़्स की कमी है सो हल्का बुख़ार है
— Adesh Rathore















