“भुला दूँ मैं “
भुला दूँ मैं वो दिन कैसे
झिझकते और दबे स्वर में
गया कमरे के भीतर मैं
पिता जी चारपाई पर
खड़ा था मैं चटाई पर
कहा क्या बात है बेटा
अभी तो रात है बेटा
मैं बोला फ़ीस भरनी थी
उसी की बात करनी थी
हिचक कर फ़ीस भर तो दी
तो फिर अब फ़ीस काहे की
ज़रा सा काम था पापा
परीक्षा फ़ॉर्म था पापा
सो कुछ पैसे ज़रूरत हैं
फ़क़त कल के महूरत हैं
पिताजी ने मुहब्बत से
कहा कल तक रुको बेटे
हुई जब भोर क़िस्मत की
कथा सब माॅं तलक पहुॅंची
तो घर के रिक्त कोनों में
हुई चर्चा ये दोनों में
हैं चुप दोनों इसी डर में
कि पैसे हैं कहाॅं घर में
सभी गहने पड़े गिरवी
ॲंगूठी है सगाई की
निशानी है यही अंतिम
न इस को डालने दूॅंगी
पिता ने इक नहीं मानी
चला कर अपनी मनमानी
जिगर पर रख लिया पत्थर
तबस्सुम को रगड़ मुख पर
ॲंगूठी डाल दी गिरवी
दिए ला कर मुझे पैसे
भुला दूँ मैं वो दिन कैसे















