बदन पर नई फ़स्ल आने लगी हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगीकोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दियाउदासी की मेहनत ठिकाने लगीजो चुप-चाप रहती थी दीवार परवो तस्वीर बातें बनाने लगीख़यालों के तारीक खंडरात मेंख़मोशी ग़ज़ल गुनगुनाने लगीज़रा देर बैठे थे तन्हाई मेंतिरी याद आँखें दुखाने लगी— Adil Mansuri