साई
साई कहाँ को जाऊँ रास्ता नहीं बचा
साई हमारे वास्ते मंज़िल नहीं लिखा
साई जो ज़ख़्म खाए थे नासूर बन गए
साई हमारे ज़ख़्म पे मरहम नहीं लगा
साई दिलों के भेद को अफ़ज़ल जानता
साई हमारा तुझ से कुछ भी नहीं छिपा
साई लबों को चूमा तो राहत मिली हमें
साई लबों से अफ़ज़ल मरहम नहीं मिला
साई हमें तो अपनों से हासिल कुछ नहीं
साई समय के पहिये ने सब दिया बता
— Afzal Sultanpuri















