abhii hamaara hai aayega par tumhaara bhi | अभी हमारा है आएगा पर तुम्हारा भी

  - Faiz Ahmad

अभी हमारा है आएगा पर तुम्हारा भी
उठाना होगा तुमको 'इश्क़ में खसारा भी

गुरूर करते हो अपना जिसे बनाके तुम
वो शक्स था ज़माने में कभी हमारा भी

बहाव ए 'इश्क़ से कैसे न बच निकलती वो
मिरा जो प्यार था साहिल का था पियारा भी

अब उनके बिन गुज़ारी जारही है ये बद-ज़ीस्त
के जिनके बिन हमें इक पल न था गवारा भी

जहाँ भी देखा उसको मुस्कुरा दिए हर वक़्त
फिर उसको याद करके ज़ख्म को उभारा भी

नज़र भी फैर लेते हैं वो देखकर मुझको
कभी यूँं था मैं जिनका जान से पियारा भी

मिरे ज़वाल के मनसूबे सोचते हैं वो
जो दे रहें हैं बाहरस मुझे सहारा भी

करीब आके पहले दिल धड़क उठाया मिरा
फिर उसने दूर जाके मुझ सेे मुझको मारा भी

इस 'इश्क़ के नशे ने मेरी रूह को अहमद
मुनाफे के बराबर ही दिया खसारा भी

  - Faiz Ahmad

Mehboob Shayari

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