अपने क़ाइफ़ से इश्क़ हो गया है

दिल-ए-ख़ाइफ़ से इश्क़ हो गया है

पढ़ रहा हूँ पुराने ख़त उस के
इन लताइफ़ से इश्क़ हो गया है

शाहज़ादा हसब-नसब वाला
और तवाइफ़ से इश्क़ हो गया है

दिख रहा है धुएँ में चेहरा तिरा
इन लफ़ाइफ़ से इश्क़ हो गया है

लग रही है बहुत शरीफ़ मुझे
इक वसाइफ़ से इश्क़ हो गया है

रोज़ आती है ख़्वाब में वो 'फ़ैज़'
इस कफ़ाइफ़ से इश्क़ हो गया है

— Faiz Ahmad

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