क़हर बरसा गई विसाल के साथ
चेहरा-ए-हुस्न-ए-बे-मिसाल के साथ
उसका मेयार-ए-हुस्न मत पूछो
आरिज़-ए-गुल-गूँ, वो भी ख़ाल के साथ
वो मुलाक़ात कैसे याद न हो
इस क़दर सादगी जमाल के साथ
उसकी सादा लिबासी है जब ज़हर
क्या सितम ढाएगी वो लाल के साथ
उसकी आँखें तो शिर्क करवा दें
उसको मत तोलिए गज़ाल के साथ
हर घड़ी नूर बढ़ता रहता है
उसकी बनती नहीं ज़वाल के साथ
ज़ेहन में चेहरा रक़्स करता रहा
रात गुज़री बड़ी मुहाल के साथ
ख़्वाहिश-ए-दिल भी थी नक़ाब हटाए
था हिजाब इस क़दर कमाल के साथ
शायरी में भी दिल नहीं लगता
दख़्ल देती है वो ख़्याल के साथ
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