tumhaare baad kya hi rah gaya jo kho sakunga main | तुम्हारे बाद क्या ही रह गया जो खो सकूँगा मैं

  - Faiz Ahmad

तुम्हारे बाद क्या ही रह गया जो खो सकूँगा मैं
गँवा के अपना सब कुछ चैन से अब सो सकूँगा मैं

कि जी करता है ख़ुद को आइने से खींच लूँ बाहर
कोई तो होगा जिस सेे फिर लिपट के रो सकूँगा मैं

लुटा दी हिज्र में उस बे-वफ़ा पर गिर्या-ओ-ज़ारी
और अब ये डर किसी की मौत पर क्या रो सकूँगा मैं

किया है जिस तरह का हाल तुमने तो ज़रा सोचो
तुम्हारे बाद भी क्या और किसी का हो सकूँगा मैं

  - Faiz Ahmad

Hijr Shayari

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