"आख़िरी ख़त"

तुम चली तो गई
पर दिल ने कभी जाने नहीं दिया तुम को
तुम्हारी याद की ज़ंजीरों से खेलता रहता है
अब क्या करूँंँ दिल तो नादान है मिरा
एक ही ज़िद पे अड़ा है अब भी तुम्हें पाने की सिर्फ़
तुम्हारे सभी ख़त को महफूज़ रखा है मैं ने मोहब्बत की तरह
के वो ख़त नहीं है बल्कि मिरी ज़िन्दगी हैं
के अब उन के सहारे ही बसर करनी पड़ेगी मुझ को
तुम नहीं तो तुम्हारी याद दिलाती हुई हर चीज़
महफूज़ हैं सब पास मिरे
वो दिन जब तुम्हें पहली दफा देखा था मिरे दिल ने
आज भी वो याद है जो देखते ही काइल हो गया
तुम्हारी सादगी़ का, हुस्न का, लफ़्ज़ों का
और हो गई तुम से मोहब्बत
वो भी इतनी के बयाँ भी न कर पाऊंँ
तुम्हारे सभी ख़त को मैं रोज़ पढ़ता हूँ
उन दिनों को याद में लाता हूँ जब हम साथ थे
उस जगह मैं आज भी जाता हूँ
जहाँ तुम दिखा करती थी मुझ को
मैं वहाँ भी जाता हूँ
जहाँ रोज़ मैं बातें किया करता था तुम से ख़यालों में
कभी कौल पे
पर एक ख़याल मुझे हर बार सता देता है फिर
बा'द में आके रुला देता है
कमज़ोर किए देता है
के अब हम साथ नहीं है
के तुम अब दूर हो मुझ से
वो भी मेरी वजह से
के मैं तुम को समझ ना सका
तेरी ख़मोशी को सुन ना सका
मैं तुम से मोहब्बत भी न कर पाया
सो जिस का अफ़सोस रहेगा मुझे
पर,
तुम अब वापस नहीं आना
के मैं जान गया हूँ मैं तुम्हारी मोहब्बत के मुक़ाबिल नहीं हूँ
तुम मिरे साथ ख़ुशी से नहीं रह पाओगी
पर अब कभी तुम मिलो मुझ से
तो मुझे दोस्त समझकर ही मिलना
के मुझ में जो धड़कता था तुम्हारे लिए
उस दिल को दफना दिया है मैं ने
मिरे अंदर जो इश्क़ था
दार पे लटका दिया है मैं ने
और अब
मेरी जानिब से तुम्हारे लिए ये आख़िरी ख़त है जिसे नज़्म बना कर तुम्हें पहुंँचा रहा हूँ
तुम्हारी बद दुआ को मैं ने सलामत रखा है
कर सको मुझ को अगर माफ तो कर देना तुम
मैं ने ग़ज़लों में सभी, बे-वफ़ा खुदको कहा है
तुम्हें जब भी कहा है, अपनी मोहब्बत कहा है

— Faiz Ahmad

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