तख़य्युलात के आँगन में जग-मगाती है वो
कुछ ऐसे मेरी ग़ज़ल को ग़ज़ल बनाती है वो
जुदा तो हो गए हैं लेकिन अब भी दोस्त हैं हम
ये सच नहीं मगर इसका यक़ीं दिलाती है वो
बरश से उसकी ही तस्वीर को बनाता हुआ
कुछ इस तरह मिरी तस्वीर को बनाती है वो
रही न नींद में राहत, न जागने में सुकून
ख़याल-ओ-ख़्वाब में आ कर बहुत सताती है वो
मुझे ख़बर है तमाम आशिकों की उसके, मगर
किसी से रब्त नहीं है यही बताती है वो
बिछड़ के 'इश्क़ में किस तरह ख़ुश रहा जाए
मैं लाख पूछ लूँ 'अहमद' नहीं बताती है वो
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