वो जिस के हिस्से में दर्द-ए-जिगर नहीं आता
उस आदमी की दुआ में असर नहीं आता
मैं आइना हूँ जो देखूँगा वो दिखाऊँगा
फ़रेब देने का मुझ को हुनर नहीं आता
ग़ुबार-ए-राह से बच बच के चलने वालों को
तमाम उम्र शुऊर-ए-सफ़र नहीं आता
दयार-ए-ज़ीस्त को क्या हो गया कि दूर तलक
उदासियों के सिवा कुछ नज़र नहीं आता
हुकूमतें मिरी उँगली पे रक़्स करती हैं
ये क्या कहा कि मुझे कुछ हुनर नहीं आता
ये वक़्त ऐसा परिंदा है जो कि ऐ 'अख़्तर'
जो उड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आता
— Akhtar Gwaliori















