ज़मीं पर है जब तक गुज़ारा हमारा

भला कैसे होगा सितारा हमारा

मैं इक जलपरी की मोहब्बत में कूदा
सो तिनका ही है अब सहारा हमारा

मोहब्बत की माला के हम दोनों मोती
तो क्यूँ कर रही हो तुम्हारा हमारा ?

भँवर में ही कट जाए ये ज़िन्दगी अब
अगर वो नहीं है किनारा हमारा

मैं कार-ए-मुसाफ़त से तंग आ गया हूँ
हमीं को न दिखता नज़ारा हमारा

अगर वो निकलती हिसार-ए-हवस से
भटकता न यूँ फिर इशारा हमारा

वो वा'दा ख़िलाफ़ी पे हँसकर के बोली
इसी से तो होता गुज़ारा हमारा

कोई हाथ जब बीच रस्ते में छूटा
लता और रफ़ी थे सहारा हमारा

— Akhil Saxena

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