उसे कब से यही समझा रहा हूँ
तिरा ही था मैं जब तेरा रहा हूँ
मुझे फ़ुर्सत दबोचे जा रही है
मैं अपने आप से उक्ता रहा हूँ
कोई भी रोकने वाला नहीं है
ख़मोशी से गुज़रता जा रहा हूँ
मिरी तिश्ना-लबी पर हँसने वाले
गुज़िश्ता वक़्त मैं दरिया रहा हूँ
वो ग़लती जो कभी की ही नहीं है
उसी ग़लती पे मैं पछता रहा हूँ
मिरी वीरान आँखें कह रही हैं
यक़ीनन मुद्दतों तन्हा रहा हूँ
ज़माना काम अपना कर रहा है
मैं अपना काम करता जा रहा हूँ
— Aks samastipuri















