ek raat lagti hai ik sehar banaane men | एक रात लगती है इक सहर बनाने में

  - Aks samastipuri

एक रात लगती है इक सहर बनाने में
हम ने क्यूँ नहीं सोचा हम-सफ़र बनाने में

मंज़िलें बदलते हो पर तुम्हें नहीं मालूम
'उम्रें बीत जाती हैं रहगुज़र बनाने में

'उम्र भर रहा हम पर उस का ही असर हावी
बे-असर रहे जिस पर हम असर बनाने में

मौज में बनाता हूँ जिस्म जिस परिंदे का
रूह काँप उठती है उस के पर बनाने में

तेरी याद की गाड़ी कुछ मदद करें शायद
इस तवील रस्ते को मुख़्तसर बनाने में

  - Aks samastipuri

Kamar Shayari

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