अब वो अगला सा इल्तिफ़ात नहीं
जिस पे भूले थे हम वो बात नहीं
मुझ को तुम से ए'तिमाद-ए-वफ़ा
तुम को मुझ से पर इल्तिफ़ात नहीं
रंज क्या क्या हैं एक जान के साथ
ज़िंदगी मौत है हयात नहीं
यूँही गुज़रे तो सहल है लेकिन
फ़ुर्सत-ए-ग़म को भी सबात नहीं
कोई दिल-सोज़ हो तो कीजे बयाँ
सरसरी दिल की वारदात नहीं
— Altaf Hussain Hali















