सड़क पर खुली खिड़कियाँ देखती हैं
सटी बाम से सीढ़ियाँ देखती हैं
हमेशा तुम्हारे लिए मुंतज़िर ये
मेरी आँखें बस तल्खियाँ देखती हैं
मैं घूँघट तले घुट गया ख़्वाब हूँ वो
वही ख़्वाब जो लड़कियाँ देखती हैं
मैं बुनता हूँ ख़ुद के लिए जाल जैसे
मुझे ग़ौर से मकड़ियाँ देखती हैं
बदल कर पता जा चुके पढ़ने वाले
पते पर गईं चिट्ठियाँ देखती हैं
— Aman Deep singh















