है कोई जो दाग़ मेरे धो सकेगा
क्या कभी सच में भी ऐसा हो सकेगा
जिसकी झोली भरता है तू मंदिरों में
तेरी झोली में वो ख़ुशियाँ बो सकेगा
नाम जप ले लड़ के मर जा उसकी ख़ातिर
कुछ भी करले पा नहीं उसको सकेगा
मैं भी कर लूँ तेरे जैसी अंधभक्ति
माफ़ करना ये न मुझ सेे हो सकेगा
क्यूँ करूँँ मैं उसकी ख़ातिर वक़्त बर्बाद
जो न मेरे आँसुओं पे रो सकेगा
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