अयाँ दोनों से तक्मील-ए-जहाँ है

ज़मीं गुम हो तो फिर क्या आसमाँ है

तिलस्माती कोई क़िस्सा है दुनिया
यहाँ हर दिन नई इक दास्ताँ है

जो तुम हो तो ये कैसे मान लूँ मैं
कि जो कुछ है यहाँ बस इक गुमाँ है

सरों पर आसमाँ होते हुए भी
जिसे देखो वही बे-साएबाँ है

किसी धरती की शायद रेत होगी
हमारे वास्ते जो कहकशाँ है

अगर था चंद-रोज़ा मौसम-ए-गुल
तो फिर दो चार ही दिन की ख़िज़ाँ है

जिसे उम्र-ए-रवाँ कहते हैं 'अंबर'
चलो देखें कहाँ तक राएगाँ है

— Ambreen Haseeb Ambar

More by Ambreen Haseeb Ambar

Other ghazal from the same pen

See all from Ambreen Haseeb Ambar →

Falak Shayari

Shers of falak.

All Falak Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling