न ज़मीन थी हमारी न ही आसमाँ हमारा

मिले आप जब हुआ है ये जहाँ जहाँ हमारा

बड़े हक़ से मेरे दिल पे वो हथेली रख के बोले
कि जहाँ जहाँ से धड़का ये वहाँ वहाँ हमारा

उसे शक था हर पल उस को ये जहाँ परख रहा है
इसी कश्मकश में लेता रहा इम्तिहाँ हमारा

जो ज़बाँ खुले तो रिश्तों की लगाम छूटती है
जिसे कह दिया हो अपना वो रहा कहाँ हमारा

सभी साथ चलने वालों की अलग अलग थी मंज़िल
वहाँ रुकते हैं जहाँ से चला कारवाँ हमारा

— Amit Bajaj

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