यही तो है बस कशमकश ज़िन्दगी कीकमी पूरी होती नहीं है किसी कीनज़र आया मरते हुए घर का चेहराअभी है बची ज़िंदगी ख़ुद-कुशी कीअमीरों के घर कोई भूका मरे अबहै लिखनी कहानी मुझे मुफ़लिसी की— Amit Kumar