जिस गली में तिरी ख़ुशबू की हवा लगती है

उस तरफ़ रूह को हर वक़्त दुआ लगती है

तुझ से मिलती हुई हर साँस वफ़ा लगती है
मेरे अश'आर में तेरी ही शिफ़ा लगती है

मैं तिरे नाम को आयत की तरह पढ़ता हूँ
और तू फिर भी किसी और की दुआ लगती है

ज़ख़्म भी आज बहुत ख़ुश हैं मिरे सीने में
तेरी यादों की हवा कुछ तो दवा लगती है

अब के जो ख़्वाब दिखे हैं वो बहुत भोले हैं
एक मासूम सी आँखों की सज़ा लगती है

तिश्नगी देख के दरिया ने भी मुँह मोड़ा है
अब ये उम्मीद भी मुझ को तो सज़ा लगती है

जिस से उम्मीद थी कुछ और उजाला होगा
अब वही शम्अ' भी बे-नूर फ़ना लगती है

क्या तअल्लुक़ है मिरी सोच से उस दुनिया का
जिस में हर बात मिरे दिल से जुदा लगती है

'देव' मय-कश है मगर इश्क़ का साधू भी है
ज़ात हर जाम में उस रब की अदा लगती है

— Amit Nandan Dev

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