Amit Nandan Dev

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Amit Nandan Dev shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Amit Nandan Dev's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

न कोई शिकवा न आँसू न मुस्कुराहट है वो शख़्स किस किस अदा से फ़रेब करता है — Amit Nandan Dev
हुनर है दर्द को लफ़्ज़ों में बुन के रख देना जो शे'र तुझ पे कहूँ वो तबीब लगता है — Amit Nandan Dev
ग़म का मौसम था तो हम चुप थे मगर शाइ'र थे सोच का ख़ून भी काग़ज़ पे बहाना पड़ा था — Amit Nandan Dev
हमारा हुस्न क्या था इक फ़क़त वहम-ए-नज़र शायद कि हर तहरीर में सौ सूरत-ए-शम्स-ओ-क़मर निकले — Amit Nandan Dev
तामीर से बस्ती कोई आबाद नहीं है दीवार गिरा देने से रस्ता नहीं होता — Amit Nandan Dev
ग़ज़ल में ज़ख़्म खिलते थे क़लम था एक ख़ूँ कोई हुनर भी मेरे अश्कों का समझता था जुनूँ कोई — Amit Nandan Dev
बिछड़ कर लोग अक्सर भूल जाते हैं ये दुनिया भी हमें हर मोड़ पे तेरा इशारा याद रहता है — Amit Nandan Dev
लबों पे आग निगाहों में रक्स-ए-ख़्वाब लिए हम आ गए हैं मोहब्बत की इक किताब लिए — Amit Nandan Dev
तह-ब-तह तहज़ीब की चादर थी जिन चेहरों पे कल वक़्त आया तो वही हम को बुरा कहने लगे — Amit Nandan Dev
'देव' अब और ये ग़ज़लें नहीं होंगी हम से सोज़-ए-ग़म है लिखा ऐसा जो मिटाए न बने — Amit Nandan Dev
मिसरा-ए-ऊला में हर बार तेरा ज़िक्र किया मिसरा-ए-सानी में बस ख़ुद को अधूरा पाया — Amit Nandan Dev
बात वो कर गया यूँँ देख के कहता क्या था साॅंस लेनी थी मगर नब्ज़ गिरानी पड़ी थी — Amit Nandan Dev
हुनर है दिल को मुयस्सर न बद-दुआ के लिए तबस्सुमात भी रक्खे हैं बस सज़ा के लिए — Amit Nandan Dev
वफ़ा की बात करें या सज़ा की ज़िक्र करें कि दोनों हुक़्म में थे और साथ साथ चले — Amit Nandan Dev
ज़हर में लिपटी हुई बातों से मैं महफ़ूज़ था अब तअल्लुक़ भी निभाया है तो तर्ज़-ए-इश्क़ से — Amit Nandan Dev
न गुल खिले न सितारों से रौशनी उतरी तेरे बग़ैर कोई रात भी कहाँ गुज़री — Amit Nandan Dev

Ghazal

डरता हूँ मैं ख़ुद अपने ही वहम-ओ-गुमान से आगे निकल गया हूँ हक़ीक़त-बयान से मंज़िल की धुन में पाँव के छालों को भूल कर हम चल पड़े हैं दूर बहुत कारवान से औक़ात मुश्त-ए-ख़ाक से बढ़ कर नहीं मिरी टकरा रहा हूँ फिर भी ज़मीं आसमान से सच की तलाश में जो बग़ावत पे आ गए बेघर हुए हैं लोग वही ख़ानदान से उस तीर-ए-नीम-कश का कलेजे में ज़ख़्म है छूटा था जो कभी किसी अब्रू-कमान से छाने लगी हैं दश्त में कैसी उदासियाँ नाज़िल हुआ अज़ाब ये किस आसमान से मैं ने सुकूत ओढ़ लिया दर्द देख कर वरना निकलती आग ही मेरी ज़बान से वीरानियों में मैं ने गुज़ारी है ज़िंदगी रुख़्सत हुए हैं ख़ाली-कफ़न इस मकान से काबे में ढूँढ़ते थे जिसे दर-ब-दर मुदाम आवाज़ आ रही है उसी ला-मकान से पाया नहीं है कुछ भी यहाँ इश्क़ में मगर क्या क्या मिला है 'देव' तुझे इस जहान से — Amit Nandan Dev
जो नज़र आता है सब को आसमाँ कुछ और है देखने वालों की आँखों का जहाँ कुछ और है इब्तिदा कुछ और थी तो इंतिहाँ कुछ और है लब पे आए जब तो देखा कहकशाँ कुछ और है जो कहा उस्ताद ने वो तो सही था लफ़्ज़ में पर अमल के इंतिहाँ में इम्तिहाँ कुछ और है ख़्वाब में जो बस्तियाँ हम ने बसाई थीं कभी आँख खुलते ही समझ आया मकाँ कुछ और है हम ने हर सू ढूँढ़ ली ता'बीर ख़्वाबों की मगर क़िस्सा-गो कुछ और था अंदाज़-ए-बयाँ कुछ और है बात सीधी भी कहूँ तो लगती है उलझी हुई हर निगह हर लफ़्ज़ हर जुम्ला यहाँ कुछ और है जो दिखा था आइनों में इक सलीबों का हुजूम रूह बोले जा रही थी कारवाँ कुछ और है हर सुख़न में लफ़्ज़ का चेहरा तो वैसा ही रहा तर्ज़-ए-इदराक़-ए-दिल-ओ-जाँ का जहाँ कुछ और है देव जो दिखता है दुनिया में वो पर्दा है फ़क़त जो नज़र आता नहीं वो साएबाँ कुछ और है — Amit Nandan Dev
ग़ुबार-ए-दिल को उठाता हूँ और देखता हूँ कोई नक़ाब हटाता हूँ और देखता हूँ बहुत दिनों से वो आई नहीं निगाहों में मैं शीशा रोज़ उठाता हूँ और देखता हूँ बिछड़ने वाला जो कहता था लौट आऊँगा मैं दर पे दीप जलाता हूँ और देखता हूँ नसीब में तो नहीं नाम लेता हूँ फिर भी मैं उस को ख़्वाब में लाता हूँ और देखता हूँ तअल्लुक़ात की मिट्टी है सूखी सूखी सी मैं उस पे अश्क गिराता हूँ और देखता हूँ कभी कभी तो ये लगता है दिल नहीं बाक़ी मैं अपनी नब्ज़ दबाता हूँ और देखता हूँ जो रूह-ओ-जिस्म से आगे का एक आलम है मैं आँख मूँद के जाता हूँ और देखता हूँ ज़माना कहता है अब कुछ नहीं बचा बाक़ी मैं एक आस जलाता हूँ और देखता हूँ वो मेरे शे'र को सुन कर भी मुस्कुराती नहीं मैं फिर भी रोज़ सुनाता हूँ और देखता हूँ नतीजा कुछ नहीं आता दु'आओं से 'देव' अब मैं हाथ फिर भी उठाता हूँ और देखता हूँ — Amit Nandan Dev
अब नहीं शौक़ मुझे और किसी हार के साथ मैं ने देखा है ख़ुदा को भी गुनहगार के साथ ख़ुद को भूला हूँ मुझे मुझ से बचा लो कोई रह गया क्या है मिरे अंदर इस इनकार के साथ ज़ख़्म कहता है चलो और भी पत्थर खाएँ इश्क़ अब खेल रहा है मिरे इक़रार के साथ उस को देखा तो कई रंग उभर आए दिल में हम ने महसूस किया इश्क़ को इज़हार के साथ वो जो ख़ुद आइनों के बीच भी खोया सा लगे कैसे समझेगा वो चेहरों को भी किरदार के साथ कोई भूखा है तो चुप-चाप पड़ा है कोने में कौन बैठा है यहाँ मर्सिया दस्तार के साथ उस ने माँगा जो मेरा हाल तो हँस कर बोला दर्द रखना है तो रख थोड़ा सा फ़नकार के साथ अब तो शायद ही कोई और सज़ा बाक़ी हो कह के मुस्काते वो जल्लाद भी तलवार के साथ देव मयख़ाने में इक बार गए लौटे नहीं क़ब्र में ढूँढ़ रहा था कोई अश'आर के साथ — Amit Nandan Dev
दिल ढूँढ़ रहा है कुछ आवाज़ न दो मुझ को मैं ख़ुद से ही रूठा हूँ अंदाज़ न दो मुझ को तन्हाई ने सीखा है ता'बीर भी छलना अब ख़्वाबों को भी कह दूँ क्या हमराज़ न दो मुझ को मैं चुप हूँ तो मतलब ये मत लेना के ख़ाली हूँ हर साँस में जलता हूँ आवाज़ न दो मुझ को गुज़री हुई सदियों का इक लम्हा हूँ शायद मैं तारीख़ को कह देना ए'जाज़ न दो मुझ को आँखों में जो तूफ़ाँ हैं वो दिल से निकलते हैं बारिश को समझ लेना आगाज़ न दो मुझ को तेरा ही तअल्लुक़ है तेरी ही बग़ावत भी अब और मुहब्बत में एराज़ न दो मुझ को अब 'देव' तअल्लुक़ भी सदियों सा लगे है क्यूँ तुम हो तो कहो फिर भी अल्फ़ाज़ न दो मुझ को — Amit Nandan Dev
कभी ख़्वाब बन के निखरते हैं हम भी कभी अश्क में रंग भरते हैं हम भी सफ़र की थकन ओढ़ते हैं तबस्सुम कभी हँस के ख़ामोश मरते हैं हम भी जला कर के ख़ुद को ही अपने दिए से अँधेरे को रौशन भी करते हैं हम भी सितारों की चुप में हैं ज़ख़्मों के अफ़्साँ कभी साँस में शोर भरते हैं हम भी लपट जिस तरह सर्द छाँव में रोए उसी दर्द को गीत करते हैं हम भी हयातों की तहरीर में जल रही जो उसी राख से ख़ुद सँवरते हैं हम भी हवा की तरह बे-सदा हो चले हैं मगर हर जगह पर बिखरते हैं हम भी अदब में छुपा है हमारा फ़साना कभी ख़ून बनकर उभरते हैं हम भी ये 'देव' अब है अक्सों में बिस्मिल सा लिक्खा किसी ख़्वाब की हद से डरते हैं हम भी क़यामत को आवाज़ देते हैं 'देव' अब कि ख़ामोशियों में उतरते हैं हम भी — Amit Nandan Dev
हम से कहिए कि ये परदा भी हटाए न बने और उन पर भी ये इल्ज़ाम लगाए न बने ख़ुद ही उलझे हैं कहीं अपने ही अफ़्साने में अब हमें दाग़ दिखाए तो दिखाए न बने ज़ख़्म ऐसे हैं जो महसूस तो होते हैं मगर इक भी चेहरा न हो जिस पे नज़र आए न बने वो नज़ारा भी हो अफ़साना भी अफ़्सोसी भी ऐसे जल्वे को ज़बाँ से तो बताए न बने ख़्वाब में आ के वो कुछ लफ़्ज़ लपक कर ले जाए फिर भी मैं पूछूँ तो कह दे कि बताए न बने हम को माज़ी में भी गुमनाम सफ़र याद रहे अब जो मंज़िल है वो रस्ता ही सुझाए न बने हम सलीबों पे भी हँसते हैं मगर शर्त ये है वो तमाशा भी हो ऐसा कि रुलाए न बने इक तमाशा है कि साया भी छलकता है वहाँ जिस जगह शम्अ' हो परवाना भी आए न बने तेरा जाना भी यहाँ जश्न का सामान हुआ दिल का आलम है मगर हाथ उठाए न बने उन की ख़ामोश नज़र पूछती है हाल मेरा और जवाबों में भी सच्चाई छुपाए न बने ख़ामुशी का भी लिबास ओढ़ के रोया है कोई अब ये मंज़र है कि आवाज़ लगाए न बने तेज़ शोलों से जो बातें थीं वो अब राख में हैं अब तो ये आग भी ऐसी है कि खाए न बने यूँँ हँसी बाँट रहा है ये हुनरमंद ज़मीर जैसे कर्ज़ा हो किसी का जो चुकाए न बने 'देव' हर शे'र में शामिल है बस इक लाश कोई जिस पे अफ़सोस भी हो और जलाए न बने — Amit Nandan Dev
रास आती है कहाँ अब ये जहाँ-बानी मुझे खींचती है दश्त की जानिब ये ज़िंदानी मुझे ज़िंदगी ने बख़्श दी है रूह-उर्यानी मुझे ढूँढ़ती है ख़ल्वतों में अपनी पिन्हानी मुझे क्या सितम है हर क़दम पर इम्तिहाँ-दर-इम्तिहाँ ज़िंदगी ने दी नहीं है कोई आसानी मुझे ज़िंदगी की धूप में जलकर हुआ हूँ आइना साफ़ दिखती है अब अपनी ही पशेमानी मुझे ज़ख़्म ही मरहम लगे हैं अब मिरे हक़ में यहाँ रास आई है अज़ाबों की फ़रावानी मुझे अक्स अपना ढूँढ़ता हूँ रफ़्तगाँ की भीड़ में देख कर मुझ को हुई है आज हैरानी मुझे मैं फ़क़त इक ज़र्रा-ए-ख़ाकी ब-ज़ाहिर ऐ ख़ुदा इश्क़ ने उस के किया है आज ला-सानी मुझे इश्क़ में सहनी पड़ी है हर जफ़ा चुपचाप ही मार डालेगी किसी दिन उसकी मनमानी मुझे राख के ज़ेर-ए-कफ़न भी आग ज़िंदा है अभी फिर मुकम्मल कर न दे ये शोला-अफ़्शानी मुझे हाल-ए-दिल जब 'देव' लिक्खा ऊला मिसरे में कभी आइना सा दे गया है मिस्रा-ए-सानी मुझे — Amit Nandan Dev
रंजिश को भुलाने में ज़रा वक़्त लगेगा दिल फिर से लगाने में ज़रा वक़्त लगेगा हर ज़ख़्म की ताज़ा है अभी अपनी कहानी क्या हाल सुनाने में ज़रा वक़्त लगेगा यूँँ उस की गली छोड़ के जाना तो पड़ा है पर ख़ुद को मनाने में ज़रा वक़्त लगेगा 'देव' उस की मोहब्बत का असर देख तो लेंगे पर होश में आने में ज़रा वक़्त लगेगा अब कौन बताए कि ये ख़ामोशियाँ क्या हैं कुछ राज़ बताने में ज़रा वक़्त लगेगा लब तक तो पहुँच जाएगी बात-ए-दिल-ओ-जाँ पर आँखों को बताने में ज़रा वक़्त लगेगा रिश्तों की सियासत से मैं थक-थक के गिरा हूँ अब ख़ुद को उठाने में ज़रा वक़्त लगेगा सहराओं में तहज़ीब के फूलों का भरम है इस वहम को जाने में ज़रा वक़्त लगेगा तदबीर से थक जाएगी ये ज़िंदगी इक दिन बस मौत को आने में ज़रा वक़्त लगेगा 'देव' अब न तसल्ली न तबीबों की ज़रूरत इस दर्द को जाने में ज़रा वक़्त लगेगा — Amit Nandan Dev
जिस गली में तिरी ख़ुशबू की हवा लगती है उस तरफ़ रूह को हर वक़्त दुआ लगती है तुझ से मिलती हुई हर साँस वफ़ा लगती है मेरे अश'आर में तेरी ही शिफ़ा लगती है मैं तिरे नाम को आयत की तरह पढ़ता हूँ और तू फिर भी किसी और की दुआ लगती है ज़ख़्म भी आज बहुत ख़ुश हैं मिरे सीने में तेरी यादों की हवा कुछ तो दवा लगती है अब के जो ख़्वाब दिखे हैं वो बहुत भोले हैं एक मासूम सी आँखों की सज़ा लगती है तिश्नगी देख के दरिया ने भी मुँह मोड़ा है अब ये उम्मीद भी मुझ को तो सज़ा लगती है जिस से उम्मीद थी कुछ और उजाला होगा अब वही शम्अ' भी बे-नूर फ़ना लगती है क्या तअल्लुक़ है मिरी सोच से उस दुनिया का जिस में हर बात मिरे दिल से जुदा लगती है 'देव' मय-कश है मगर इश्क़ का साधू भी है ज़ात हर जाम में उस रब की अदा लगती है — Amit Nandan Dev
हर हक़ीक़त से बड़ी है वहम की भी ज़िंदगी एक आइना है बस और आइने की ज़िंदगी सच की तह तक जा न पाए ज़ौक़-ए-हर्फ़-ए-आख़िरी हम ने पहनी थी मुख़ालिफ़ सोच की भी ज़िंदगी दर्द से जो बात निकली रूह तक पहुँची नहीं इक जली सी बेल थी सूखी दुआ थी ज़िंदगी तर्क कर दी हम ने उस हस्ती की सारी पैरवी जिस ने रक्खी थी गिरह में बे-हुनर सी ज़िंदगी क़ब्र तक हम बख़्त की तहज़ीब समझे ही नहीं ज़हर को कहते रहे कुछ लोग मीठी ज़िंदगी शोहरतें अफ़्साने दुनिया सब को धिक्कारे कोई क्यूँ न हो तर्क-ए-जहाँ की इब्तिदा भी ज़िंदगी ज़ुर्म भी मैं ने किए पर जुर्म के अंदाज़ से दुश्मनों को भी लगी थी बा-वफ़ा सी ज़िंदगी हर समय बन कर रहा मैं तर्जुमान-ए-ख़ामुशी सर्फ़-ए-ग़म थी सर्फ़-ए-शेर-ओ-मय-कदा सी ज़िंदगी सोचता हूँ आख़िरश क्या खो दिया क्या पा लिया जब मिला कुछ तब नसीबों में कहाँ थी ज़िंदगी 'देव' ग़ालिब की तरह तह में उतर कर सोचते क्या हक़ीक़त क्या तख़य्युल बस ग़ज़ल थी ज़िंदगी — Amit Nandan Dev
फिर दस्त-ए-बे-ख़ुदी में क़लम है हिसाब में लिखता हूँ नाम-ए-इश्क़ को ग़म के किताब में कुछ तो था और जो नज़र आया न उम्र भर कुछ तो छुपा था दर्द का लुत्फ़-ए-शराब में तहज़ीब जो भी थी वो लहू में नहाई है हम ने चराग़ रक्खे थे साए के बाब में हर ख़ुशबू एक दर्द से उठती रही तमाम सौ चाक थे बदन पे मगर इक गुलाब में इज़हार के लिबास में तहज़ीब का लहू हर इक हँसी थी नक़्ल किसी इज़्तिराब में रक़्साँ थी आग हर्फ़ थे भीगे हुए मगर था एक अजब सुकूत सा तेरे ख़िताब में रौशन हुई न थी कभी दीवार-ओ-दर से रूह लेकिन मिला था नूर कोई इक हिजाब में इज़हार तक न आई कोई चीख़ उम्र भर जैसे कि दम था अर्सा-ए-क़ुर्बत के ख़्वाब में रूठा जो एक ख़्वाब था ता'बीर बन गया मैं डूबता गया किसी उलझे सराब में दरवेश बन के लौटे वो सूफ़ी-ए-बद-गुमाँ क्या क्या न देख आए हैं हम तो नक़ाब में हम बे-सबब न थे कि भटकते थे दर-ब-दर कुछ जल चुका था नक़्श-ए-क़दम आफ़ताब में हर बात है अदू की मगर लफ़्ज़ अपने हैं कहता हूँ आज मौत को भी इज़्तिराब में रक्साँ हुआ था हिज्र में इक बाग़ बे-सबब फिर ज़हर डाल दी किसी ने चश्म-ए-आब में वो खूँ-रिज़ी भी शौक़ की और इश्क़ भी हराम हम भी शरीक़ थे किसी दीन-ए-शराब में तारीकियाँ ही काफ़ी थीं शो'ला बनाने को क्या हम को रौशनी ने दिया है सवाब में अब देव हर जवाब से उठता है इक सवाल हम से न पूछ मौज थी किस के शबाब में — Amit Nandan Dev
निकल पड़ा हूँ मैं फिर बाद-ए-कुह्न-यार चले जिधर भी दिल का इशारा हो बे-क़रार चले निकल पड़े हैं सुलगते हुए शरार चले न कोई राह न मंज़िल न रहगुज़ार चले उठा के बस्त-ए-गिरेबाँ में चंद गर्दिश-ए-ग़म तलाश-ए-कू-ए-वफ़ा में भी हम बहार चले किसी ने पूछा कि क्या हाल है बिछड़ने का हम अपनी रूह के टुकड़ों में बार-बार चले न था वो ज़िक्र मगर दिल ने फिर उछाली बात कि यूँँ ही ज़ख़्म से निकले यूँँ ही बहार चले सुनाई दे कहीं फिर साज़-ए-दिल की धीमी सदा कि कब तलक ये ख़मोशी का कारोबार चले नसीब क्या था हमें लफ़्ज़ क्या मुयस्सर थे कि एक नाम पे बस दर-ब-दर ख़ुमार चले किसी ने हाथ बढ़ाया न कोई हमदम था हम अपने साए को ले कर भी बे-क़रार चले निशात-ए-ग़म से गुज़र कर ख़िज़ाँ की राह चले कि फिर बहार की सूरत सुलूक-ए-दार चले तमाम उम्र बयानों से सख़्त ज़ख़्म मिले कभी तो ख़ून-ए-हक़ीक़त में इस्तिख़ार चले हमें ख़बर थी कि इस राह में उजाले कम मगर जुनूँ की तहम्मुल में बार-बार चले ग़मों का शौक़ था इतना कि ख़ुद भी रुक न सके कहीं बहार से निकले तो सू-ए-दार चले हिजाब-ए-शहर में हम क़ाफ़िला न बन पाए तो सुर्ख़-रू कभी कूचा कभी मज़ार चले जो ख़्वाब देख के निकले थे कूचा-ए-ग़म से वो ख़्वाब भी मिरे आख़िर मिज़ा-ए-दार चले गुनाह था कि बग़ावत ज़माना देख चुका हम एक जश्न में शामिल थे फिर शिकार चले मुझे न थी कभी मंज़िल से 'देव' कोई निस्बत मगर जो राह में रोया वो शहसवार चले सबा के पास थे नक़्शे तमाम दहर के ग़म मगर वो सोचती किस दम किधर ग़ुबार चले हवा-ए-दश्त में जलते हैं ताज भी सर भी हम एक चराग़ बुझाने का इख़्तियार चले किसी को शौक़ था अज़्मत किसी को लालच थी हम ऐसे लोग थे जो ख़ाक के क़रार चले ख़ुदा ने हम सेे कहा था कि हौसला रखना मगर बशर थे जहाँ के हर इख़्तियार चले न अब वो सोज़ न रंगीनियों का हाल कोई हम अपने दिल की गिरह तक लिए बिसार चले वही अज़ाब कि हर सम्त आरज़ू ठहरी किसी को देख के रोना किसी को प्यार चले हयात-ए-ज़ीस्त का नक़्शा मिटा चुके 'देव' अब हम अपने ख़्वाब से निकले तो यादगार चले — Amit Nandan Dev
कोई आवाज़ न आए तो सुनाया जाए ख़ुद से ख़ुद को भी कभी जा के मिलाया जाए भीड़ में जब भी कोई शख़्स अकेला दिखे तो हाथ था में उसे चुप-चाप बुलाया जाए काँच जैसी है ये उम्मीद भी टूटे न कहीं ख़्वाब आँखों में हैं पलकों में छुपाया जाए धूप में जलते हुए देखे हैं रिश्ते हम ने अब कोई पेड़ भी छाँव का लगाया जाए क़ैद में हैं कई जज़्बात कई सन्नाटे दर-ओ-दीवार को थोड़ा तो हिलाया जाए हर नया ज़ख़्म भी इक ताज़ा ग़ज़ल कहता है किसी पत्थर को भी इक दर्द सुनाया जाए जो भी आया है यहाँ दर्द का सौदा कर के दिल में इक और मुसाफ़िर को बसाया जाए हम को ये फ़िक्र नहीं कौन हमारा क्या है हर किसी शख़्स को बस प्यार कराया जाए ये ज़माना है कि जो झूठ में रंगे हैं सभी अपने चेहरे को ही आईना बनाया जाए ख़्वाब बेचैन हैं आँखों को भी डर लगता है आज फिर नींद से समझौता कराया जाए धूप में जलते ये जिस्मों की चिताओं से परे एक चूल्हे को भी इक ख़्वाब बताया जाए जिस को माना था ख़ुदा अब वही पत्थर निकला अब किसी मोम की मूरत को सजाया जाए आइए आज कोई काम मोहब्बत वाला टूटे बच्चों के खिलौनों को हँसाया जाए अब ये दुनिया न रहे तो किसे ग़म है फिर देव इक मोहब्बत को तो महसूस कराया जाए आख़िरी शे'र है पढ़ लो तो दुआ देना मुझे किसी बच्चे को भी अब साथ खिलाया जाए — Amit Nandan Dev
दिल के वीरान मकानों में सदा कोई नहीं अब तो एहसास का क़र्ज़-ए-वफ़ा कोई नहीं जो भी लम्हा था वो सौदा था किसी ताजिर का अब मुहब्बत का कोई रंग कोई जा कोई नहीं मैं ने चेहरों की दुकानों में उजाले देखे पर नज़र भर के जो देखूँ तो ख़ुदा कोई नहीं रूह पत्थर थी न आँसू थे न आवाज़ें थीं इक गुमाँ था कि मैं ज़िंदा हूँ भला कोई नहीं जिस ने चाहा वही एहसान सा देता निकला अब दुआ माँग भी लूँ तो भी दुआ कोई नहीं साँस चलती है मगर ज़िन्दगी महसूस नहीं दिल धड़कता है मगर उस में सदा कोई नहीं देव तन्हाई से रिश्ता ही रहा हर लम्हा वरना इस भीड़ में अपनों की अदा कोई नहीं — Amit Nandan Dev
ज़ह्र है हुस्न या दवा है क्यूँँ जिस से भी दिल लगे ख़फ़ा है क्यूँँ हम ने बुझ कर भी दिल जलाया है शम्अ' ही शम्अ' हर दिशा है क्यूँँ कौन सा राज़ है तअल्लुक़ में जो कहीं भी न बोलता है क्यूँँ दिल जिसे देख कर न बिछला था अब उसी पर ये इल्तिजा है क्यूँँ ज़ाहिदों कब तलक गुनाहों पर ये ख़ुदा की सदा-सदा है क्यूँँ जिस्म हर सू लहू में तर क्यूँ है इश्क़ ही इश्क़ की सज़ा है क्यूँँ शोर है फिर से गुमशुदा दिल का ये मुक़द्दर ही बद-दुआ है क्यूँँ तू भी मुँह फेर कर गया यूँँ देव अब ये आईना बेहया है क्यूँँ देव तू भी अगर है अहल-ए-सुख़न हर ग़ज़ल में ये सिलसिला है क्यूँँ — Amit Nandan Dev