फिर दस्त-ए-बे-ख़ुदी में क़लम है हिसाब में
लिखता हूँ नाम-ए-इश्क़ को ग़म के किताब में
कुछ तो था और जो नज़र आया न उम्र भर
कुछ तो छुपा था दर्द का लुत्फ़-ए-शराब में
तहज़ीब जो भी थी वो लहू में नहाई है
हम ने चराग़ रक्खे थे साए के बाब में
हर ख़ुशबू एक दर्द से उठती रही तमाम
सौ चाक थे बदन पे मगर इक गुलाब में
इज़हार के लिबास में तहज़ीब का लहू
हर इक हँसी थी नक़्ल किसी इज़्तिराब में
रक़्साँ थी आग हर्फ़ थे भीगे हुए मगर
था एक अजब सुकूत सा तेरे ख़िताब में
रौशन हुई न थी कभी दीवार-ओ-दर से रूह
लेकिन मिला था नूर कोई इक हिजाब में
इज़हार तक न आई कोई चीख़ उम्र भर
जैसे कि दम था अर्सा-ए-क़ुर्बत के ख़्वाब में
रूठा जो एक ख़्वाब था ता'बीर बन गया
मैं डूबता गया किसी उलझे सराब में
दरवेश बन के लौटे वो सूफ़ी-ए-बद-गुमाँ
क्या क्या न देख आए हैं हम तो नक़ाब में
हम बे-सबब न थे कि भटकते थे दर-ब-दर
कुछ जल चुका था नक़्श-ए-क़दम आफ़ताब में
हर बात है अदू की मगर लफ़्ज़ अपने हैं
कहता हूँ आज मौत को भी इज़्तिराब में
रक्साँ हुआ था हिज्र में इक बाग़ बे-सबब
फिर ज़हर डाल दी किसी ने चश्म-ए-आब में
वो खूँ-रिज़ी भी शौक़ की और इश्क़ भी हराम
हम भी शरीक़ थे किसी दीन-ए-शराब में
तारीकियाँ ही काफ़ी थीं शो'ला बनाने को
क्या हम को रौशनी ने दिया है सवाब में
अब देव हर जवाब से उठता है इक सवाल
हम से न पूछ मौज थी किस के शबाब में















