हम से कहिए कि ये परदा भी हटाए न बने

और उन पर भी ये इल्ज़ाम लगाए न बने

ख़ुद ही उलझे हैं कहीं अपने ही अफ़्साने में
अब हमें दाग़ दिखाए तो दिखाए न बने

ज़ख़्म ऐसे हैं जो महसूस तो होते हैं मगर
इक भी चेहरा न हो जिस पे नज़र आए न बने

वो नज़ारा भी हो अफ़साना भी अफ़्सोसी भी
ऐसे जल्वे को ज़बाँ से तो बताए न बने

ख़्वाब में आ के वो कुछ लफ़्ज़ लपक कर ले जाए
फिर भी मैं पूछूँ तो कह दे कि बताए न बने

हम को माज़ी में भी गुमनाम सफ़र याद रहे
अब जो मंज़िल है वो रस्ता ही सुझाए न बने

हम सलीबों पे भी हँसते हैं मगर शर्त ये है
वो तमाशा भी हो ऐसा कि रुलाए न बने

इक तमाशा है कि साया भी छलकता है वहाँ
जिस जगह शम्अ' हो परवाना भी आए न बने

तेरा जाना भी यहाँ जश्न का सामान हुआ
दिल का आलम है मगर हाथ उठाए न बने

उन की ख़ामोश नज़र पूछती है हाल मेरा
और जवाबों में भी सच्चाई छुपाए न बने

ख़ामुशी का भी लिबास ओढ़ के रोया है कोई
अब ये मंज़र है कि आवाज़ लगाए न बने

तेज़ शोलों से जो बातें थीं वो अब राख में हैं
अब तो ये आग भी ऐसी है कि खाए न बने

यूँ हँसी बाँट रहा है ये हुनरमंद ज़मीर
जैसे कर्ज़ा हो किसी का जो चुकाए न बने

'देव' हर शे'र में शामिल है बस इक लाश कोई
जिस पे अफ़सोस भी हो और जलाए न बने

— Amit Nandan Dev

More by Amit Nandan Dev

Other ghazal from the same pen

See all from Amit Nandan Dev →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling