डरता हूँ मैं ख़ुद अपने ही वहम-ओ-गुमान से

आगे निकल गया हूँ हक़ीक़त-बयान से

मंज़िल की धुन में पाँव के छालों को भूल कर
हम चल पड़े हैं दूर बहुत कारवान से

औक़ात मुश्त-ए-ख़ाक से बढ़ कर नहीं मिरी
टकरा रहा हूँ फिर भी ज़मीं आसमान से

सच की तलाश में जो बग़ावत पे आ गए
बेघर हुए हैं लोग वही ख़ानदान से

उस तीर-ए-नीम-कश का कलेजे में ज़ख़्म है
छूटा था जो कभी किसी अब्रू-कमान से

छाने लगी हैं दश्त में कैसी उदासियाँ
नाज़िल हुआ अज़ाब ये किस आसमान से

मैं ने सुकूत ओढ़ लिया दर्द देख कर
वरना निकलती आग ही मेरी ज़बान से

वीरानियों में मैं ने गुज़ारी है ज़िंदगी
रुख़्सत हुए हैं ख़ाली-कफ़न इस मकान से

काबे में ढूँढ़ते थे जिसे दर-ब-दर मुदाम
आवाज़ आ रही है उसी ला-मकान से

पाया नहीं है कुछ भी यहाँ इश्क़ में मगर
क्या क्या मिला है 'देव' तुझे इस जहान से

— Amit Nandan Dev

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