हर हक़ीक़त से बड़ी है वहम की भी ज़िंदगी
एक आइना है बस और आइने की ज़िंदगी
सच की तह तक जा न पाए ज़ौक़-ए-हर्फ़-ए-आख़िरी
हम ने पहनी थी मुख़ालिफ़ सोच की भी ज़िंदगी
दर्द से जो बात निकली रूह तक पहुँची नहीं
इक जली सी बेल थी सूखी दुआ थी ज़िंदगी
तर्क कर दी हम ने उस हस्ती की सारी पैरवी
जिस ने रक्खी थी गिरह में बे-हुनर सी ज़िंदगी
क़ब्र तक हम बख़्त की तहज़ीब समझे ही नहीं
ज़हर को कहते रहे कुछ लोग मीठी ज़िंदगी
शोहरतें अफ़्साने दुनिया सब को धिक्कारे कोई
क्यूँ न हो तर्क-ए-जहाँ की इब्तिदा भी ज़िंदगी
ज़ुर्म भी मैं ने किए पर जुर्म के अंदाज़ से
दुश्मनों को भी लगी थी बा-वफ़ा सी ज़िंदगी
हर समय बन कर रहा मैं तर्जुमान-ए-ख़ामुशी
सर्फ़-ए-ग़म थी सर्फ़-ए-शेर-ओ-मय-कदा सी ज़िंदगी
सोचता हूँ आख़िरश क्या खो दिया क्या पा लिया
जब मिला कुछ तब नसीबों में कहाँ थी ज़िंदगी
'देव' ग़ालिब की तरह तह में उतर कर सोचते
क्या हक़ीक़त क्या तख़य्युल बस ग़ज़ल थी ज़िंदगी















