लफ़्ज़ों को पहले आप तराज़ू में तोलिए
फिर उस के बा'द ज़ख़्म-ए-निहाँ लब से खोलिए
साए को हम-सफ़र जो समझ बैठे थे यहाँ
सूरज ढला तो ख़ुद को अँधेरों में खो लिए
कहने को हम भी साहिब-ए-अक़्ल-ओ-शऊर थे
दीवानगी की भीड़ में शामिल जो हो लिए
मंज़िल समझ के बैठ गए राह में जहाँ
साए घने दरख़्त के देखे तो सो लिए
लफ़्ज़ों में सादगी का भरम अब नहीं रहा
बेहतर है गुफ़्तगू में इशारों से बोलिए
सहरा-ए-ज़िंदगानी में हम ने भी दोस्तो
काँटे उगाए दर्द के पौधे भी बो लिए
दीवानगी में 'देव' बड़ा लुत्फ़ था हमें
दाना हुए तो अपनी समझ को ही रो लिए
— Amit Nandan Dev















