ग़ुबार-ए-दिल को उठाता हूँ और देखता हूँ
कोई नक़ाब हटाता हूँ और देखता हूँ
बहुत दिनों से वो आई नहीं निगाहों में
मैं शीशा रोज़ उठाता हूँ और देखता हूँ
बिछड़ने वाला जो कहता था लौट आऊँगा
मैं दर पे दीप जलाता हूँ और देखता हूँ
नसीब में तो नहीं नाम लेता हूँ फिर भी
मैं उस को ख़्वाब में लाता हूँ और देखता हूँ
तअल्लुक़ात की मिट्टी है सूखी सूखी सी
मैं उस पे अश्क गिराता हूँ और देखता हूँ
कभी कभी तो ये लगता है दिल नहीं बाक़ी
मैं अपनी नब्ज़ दबाता हूँ और देखता हूँ
जो रूह-ओ-जिस्म से आगे का एक आलम है
मैं आँख मूँद के जाता हूँ और देखता हूँ
ज़माना कहता है अब कुछ नहीं बचा बाक़ी
मैं एक आस जलाता हूँ और देखता हूँ
वो मेरे शे'र को सुन कर भी मुस्कुराती नहीं
मैं फिर भी रोज़ सुनाता हूँ और देखता हूँ
नतीजा कुछ नहीं आता दु'आओं से 'देव' अब
मैं हाथ फिर भी उठाता हूँ और देखता हूँ















